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लम्हें (Lamhe) By Mohit

लम्हें (Lamhe) By Mohit

जलाया था मैंने जिन कागज़ के टुकड़ों को,
क्यूँ वही टुकड़े यादों के निशान हो गये,
किये थे जो मुकाम हासिल ऊँचाइयों के,
आज क्यों वो ही मुकाम अनजाने हो गये,

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