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ज़िन्दगी

By Mohit


 

रोज़ रोते हुए कहती है मुझसे मेरी ये ज़िन्दगी,
एक इंसान की खातिर मुझे यूँ बर्बाद तो ना कर,

यूँ जिंदा रहने की कोई एक वजह तो बता,
खुद अपनी मौत का कारण तैयार तो ना कर,
मिलता नहीं हर बार जिसे चाहें जान ले तू,
अगर मिले तो उसका अपमान तो ना कर,

किस्से कहानियां तो बहुत बनाती है ये दुनिया,
उस झूठे प्यार पर इतना गुमान तो ना कर,
कागज़ की कश्तियाँ डूब जाती हैं लहरों में,
उनके वजूद को इस तरह गुमनाम तो ना कर,

तनहा रहना है अब तो उम्र भर के लिए,
ये सोच कर खुद को यूँ परेशां तो न कर,
तोड़ा था ये नादान दिल तेरा जिसने,
उस बेवफा के जाने का मलाल तो ना कर,

भीड़ में रहा तू अकेला कुछ वक्त के लिए,
उस वक्त के लौटने का ख्याल तो ना कर,
किस्मत का नाम देता रहा उसके फैसले को,
किस्मत को उसके इतने सामान तो ना कर,

धोखा खाता रहा चुप चाप क्यूँ तू खड़ा खड़ा,
धोखे को प्यार मैं बदलने का अरमान तो ना कर,
एहसास तो तेरे दिल में रहेगा हमेशा उसका,
उसे मिटाने के लिए खुद को बेहाल तो ना कर,

इस दिल की सुर्ख दीवार पर लिखा था नाम जिसका,
कहती हैं निगाहें ,उसके आने का इंतज़ार तो ना कर,
रूठ कर क्यूँ बैठा है तू बेखबर दुनिया से इस कदर,
उस बेवफा के नाम दुनिया को यूँ बदनाम तो न कर,

इन फासलों को मिटाने के लिए तड़प रहा है क्यूँ?
जो बीत चुका उसे दोहराने का कमाल तो ना कर….
रोज़ रोते हुए कहती है मुझसे मेरी ये ज़िन्दगी,
एक इंसान की खातिर मुझे यूँ बर्बाद तो ना कर……..बर्बाद तो ना कर..

By Mohit


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