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लम्हें

By Mohit


 

ढूंड़ता हूँ उन हसीं लम्हों को,
जो वक्त की रेत मैं कहीं दफन हो गये,
मालाएं पिरोई थी मैंने सपनो की,
बिखर कर अंधेरों मैं जो कहीं खो गये,

जलाया था मैंने जिन कागज़ के टुकड़ों को,
क्यूँ वही टुकड़े यादों के निशान हो गये,
किये थे जो मुकाम हासिल ऊँचाइयों के,
आज क्यों वो ही मुकाम अनजाने हो गये,

बनाना चाहता था उस गैर को भी अपना,
पर मेरे अपने ही मुझसे जो खफा हो गये,
मंज़र थे मेरी आँखों के सामने कुछ ऐसे,
मेरे इन गहरे ज़ख्मो के जो गवाह हो गये,

मिला वही जो लिखा था मेरी तकदीर में ,
क्यूँ इस कदर ना जाने वो मेरे खुदा हो गये,
बिछड़ कर झुलसता रहा गमों की आग में,
लगता है जैसे पश्यताप भी गुनाह हो गये,

रोता रहा रात भर सिसकते हुते कोने में,
रूठ कर कुछ मेरे अपने दूर मुझसे यूं हो गये,
जिंदा हूँ न जाने ऐ ज़िन्दगी किस तरह मैं ,
लगता है मौत से भी रास्ते ये जुदा हो गये……..

By Mohit


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